गोदान : एक किसान की अधूरी हसरत और टूटते समाज का सच

आजकल एक ऐसा दौर चल रहा है जहाँ कुछ लोग अपनी बौद्धिक कुंठा या कथित आधुनिकता के फेर में प्रेमचंद, निराला और प्रसाद जैसे कालजयी रचनाकारों को नकारने की कोशिश करते हैं। ऐसा करके वे अपनी किसी नई दृष्टि का नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक शून्यता का ही परिचय देते हैं। बहरहाल, हम यहाँ बात करेंगे मुंशी प्रेमचंद के सबसे चर्चित और अमर उपन्यास ‘गोदान’ की।

गोदान केवल भारतीय ग्रामीण और कृषक जीवन का शोकगीत या महाकाव्य भर नहीं है; यह उससे कहीं आगे बढ़कर प्रगतिशील और दूरदर्शी लेखनी का एक नायाब दस्तावेज़ है। उपन्यास में कई ऐसे प्रसंग आते हैं जिन्हें पढ़कर यह स्पष्ट महसूस होता है कि प्रेमचंद अपने समय से मीलों आगे देखने वाले ‘भविष्यदृष्टा’ थे।

उदाहरण के तौर पर, होरी और ज़मींदार राय साहब की बातचीत का वह प्रसंग देखिए, जहाँ खुद ज़मींदार होते हुए भी राय साहब कहते हैं:
“यह तो निश्चित है कि आने वाले समय में ज़मींदारी छीन ली जाएगी और सरकार भी हमारी रक्षा नहीं करेगी, क्योंकि हमसे अब उसका कोई स्वार्थ नहीं निकलता। लक्षण कह रहे हैं कि बहुत जल्द हमारे वर्ग की हस्ती मिट जाने वाली है।”

प्रेमचंद यह बात 1936 में लिख रहे थे, जब गोदान प्रकाशित हुआ था। और इसके ठीक डेढ़ दशक बाद, 1950 से 1955 के बीच आज़ाद भारत में ज़मींदारी उन्मूलन कानून बने और यह व्यवस्था सचमुच इतिहास बन गई।

इसी तरह, सिनेमाई दुनिया में ‘एंग्री यंग मैन’ का खिताब भले ही अमिताभ बच्चन के खाते में दर्ज हो, लेकिन मेरा मानना है कि हिंदी साहित्य का पहला सच्चा ‘एंग्री यंग मैन’ होरी का बेटा गोबर (गोवर्धन) है। जिस तरह वह गाँव की सामंती बेगार, पाखंडी मर्यादाओं और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ़ तनकर खड़ा होता है और सीधे आँखें तरेरता है, वह उस विद्रोही युवा चेतना का पहला सशक्त प्रतीक है।

यही प्रगतिशीलता राय साहब के यहाँ होने वाली महफ़िलों और बहसों में भी दिखाई देती है। दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर मिस्टर मेहता जब कहते हैं—
“मुझे उन लोगों से हमदर्दी नहीं है, जो बातें तो करते हैं कम्युनिस्टों की सी, मगर जीवन है रईसों का—उतना ही विलासमय, उतना ही स्वार्थ से भरा हुआ…”

तो आज के दौर में यह बात और भी मौज़ूं लगती है। कई बार देखकर अफ़सोस होता है कि आगे चलकर इसी किस्म के सुविधाभोगी और नकली प्रगतिशीलों ने बौद्धिक विमर्शों पर कब्ज़ा जमाया और ज़मीनी संघर्ष करने वालों को हाशिए पर धकेल दिया।

‘गोदान’ ऐसे ही अनगिनत जीवंत और चुभते हुए प्रसंगों से भरा पड़ा है। यह उपन्यास हर उस इंसान को पढ़ना चाहिए जो इस मुल्क की रगों में दौड़ती सच्चाइयों को समझना चाहता है। आइए, अब गोदान की इस महागाथा और उसकी परतों पर विस्तृत चर्चा को आगे बढ़ाते हैं—

दो गाँव और दो अलग-अलग दुनियाएँ
कहानी दो गाँवों के इर्द-गिर्द घूमती है—बेलारी और सेमरी। दोनों के बीच फासला सिर्फ़ पाँच मील का है, लेकिन दोनों की दुनिया में ज़मीन-आसमान का फर्क है।

बेलारी पसीने, भूख, धूल और अंतहीन कर्ज़ में डूबे किसानों का गाँव है। वहीं सेमरी में ज़मींदारी ठाठ-बाट, महफ़िलें और कुर्सी की राजनीति चलती है। प्रेमचंद साफ़ दिखाते हैं कि किसान सिर्फ़ खेत में हल नहीं चलाता, बल्कि वह उस कर्ज़ के चक्रव्यूह में भी फँसा रहता है जिससे निकल पाना उसके बस की बात नहीं। लगान देना है, बीज के पैसे जुटाने हैं, बिरादरी की मर्यादा निभानी है और फिर महाजन का भारी ब्याज भरना है। किसान की पीठ पर लदा यह बोझ कभी हल्का नहीं होता।

होरी: ‘मर्यादा’ के बोझ तले दबा एक सीधा इंसान
होरी इस उपन्यास की धड़कन है। वह कोई इंक़लाबी नेता नहीं है जो झंडा लेकर व्यवस्था से भिड़ जाए। वह एक सीधा, डरा हुआ और पारंपरिक किसान है।

  • एक गाय की चाहत: होरी का सबसे बड़ा सपना कोई धन-दौलत नहीं, बस अपने दरवाजे पर बंधी एक गाय देखना है। ग्रामीण समाज में गाय सिर्फ़ दूध देने वाला मवेशी नहीं, बल्कि किसान की इज़्ज़त और मोक्ष का प्रतीक मानी जाती थी। होरी अपनी पूरी ज़िंदगी इसी एक ख्वाहिश के पीछे होम कर देता है।
  • भाग्य का मारा: होरी पर जब भी कोई ज़ुल्म होता है, वह उसे अपने ‘कर्मों का फल’ या ‘भाग्य’ मानकर चुपचाप सह लेता है। उसकी सोच यही है कि बड़े लोग मालिक हैं और छोटों का काम उनकी चाकरी करना है।
  • अपनों की ईर्ष्या: गरीबी केवल पेट नहीं मारती, वह रिश्तों का खून भी कर देती है। होरी बड़ी हसरतों से जिस गाय को घर लाता है, उसका सगा भाई हीरा जलन के मारे उसे ज़हर देकर मार डालता है। यह घटना दिखाती है कि अभावों ने किस तरह भाईचारे को भी विषैला बना दिया था।

धनिया: जो झुकना नहीं, लड़ना जानती है
होरी जहाँ हाथ जोड़कर हर ज़ुल्म सह लेता है, वहीं उसकी पत्नी धनिया खुलकर आँखें तरेरती है। धनिया हिंदी साहित्य के सबसे जानदार किरदारों में से एक है। वह अच्छी तरह जानती है कि गाँव के पंडित, पटवारी और महाजन किस तरह गरीबों की खाल खींचते हैं।

जब उसका बेटा गोबर एक विधवा झुनिया को गर्भवती करके शहर भाग जाता है, तब पूरा गाँव थू-थू करने लगता है। लेकिन धनिया उस बेसहारा झुनिया को घर में पनाह देती है। वह जानती है कि पंचायत उस पर टूटेगी, बिरादरी हुक्का-पानी बंद करेगी, फिर भी वह ममता और इंसानियत का साथ नहीं छोड़ती। धनिया असल में उस संघर्षशील ग्रामीण औरत का चेहरा है जो पूरे बिखरते परिवार को अपने दम पर थामे रखती है।

धर्म और जाति का दोहरा पाखंड
गोदान में प्रेमचंद ने धर्म के ठेकेदारों और जातिवादी सड़ांध का असली चेहरा बेनक़ाब किया है।

  • पंडित दातादीन और लाला पटेश्वरी: ये लोग धर्म और बिरादरी के नियमों की आड़ में सिर्फ़ अपना स्वार्थ साधते हैं। जब झुनिया घर आती है, तो पंचायत बैठती है और होरी पर भारी जुर्माना ठोक देती है। यह जुर्माना होरी की बची-खुची कमर भी तोड़ देता है।
  • मातादीन और सिलिया का प्रसंग: उपन्यास में पंडित मातादीन का एक दलित युवती सिलिया के साथ शारीरिक संबंध तो रहता है, लेकिन वह उसे अपनी रसोई और बर्तनों को छूने नहीं देता। देह का भोग पवित्र है, मगर इंसान अछूत! यह प्रसंग समाज के उस घिनौने जातिवादी पाखंड पर प्रेमचंद का सबसे करारा तमाचा है।

गोबर: नई पीढ़ी का गुस्सा और बगावत
होरी का बेटा गोबर (गोवर्धन) उस नई पीढ़ी का प्रतीक है जो ‘भाग्य’ के नाम पर सिर झुकाने को तैयार नहीं है। वह गाँव की सामंती बेगार और छुआछूत पर सीधे सवाल उठाता है।

गाँव छोड़कर जब वह लखनऊ जाता है और एक मिल में मजदूरी करता है, तो उसे समझ आता है कि शोषण केवल खेत-खलिहान में नहीं है, बल्कि शहर के बड़े कारखानों में भी है। गोबर अधिकारों के लिए लड़ना और तनकर खड़ा होना सीखता है—वही काम जो उसका बाप पूरी उम्र नहीं कर सका।

शहर का दायरा: मेहता और मिस मालती
प्रेमचंद ने कहानी को सिर्फ़ देहात तक सीमित नहीं रखा। वे लखनऊ के चमचमाते ड्राइंग रूम्स और क्लबों की दुनिया भी दिखाते हैं।

यहाँ प्रोफेसर मेहता जैसे बुद्धिजीवी हैं, जो किताबी बातों से ऊपर उठकर सादगी और सेवा को तरजीह देते हैं। वहीं मिस मालती हैं, जो शुरुआत में पश्चिमी रंग-ढंग में ढली औरत लगती हैं। लेकिन जैसे-जैसे वे ज़मीनी हक़ीक़त और मेहता के विचारों से रूबरू होती हैं, उनका रूप बदलता है और वे गरीबों के इलाज और सेवा में अपनी ज़िंदगी लगाने लगती हैं। प्रेमचंद इसके ज़रिए समझाते हैं कि असली आधुनिकता सिर्फ़ अंग्रेज़ी बोलने या फैशनेबल कपड़े पहनने में नहीं, बल्कि सोच और काम में होती है।

ज़मींदार राय साहब: मीठी ज़बान, कड़वा सच
सेमरी के ज़मींदार राय साहब अमरपाल सिंह एक दोहरे चेहरे वाले इंसान हैं। वे किसानों के सामने बड़े हमदर्द बनते हैं, साहित्य की बातें करते हैं और आज़ादी की दुहाई देते हैं। लेकिन जब अपनी जेब भरने और राजनीति चमकाने की बात आती है, तो वे लगान वसूलने में ज़रा भी रहम नहीं दिखाते। वे उस ‘शक्कर की छुरी’ की तरह हैं जो मीठा बोलकर ही किसान का गला रेत देती है।

वो बीस आने… और कलेजा चीर देने वाला अंत
उपन्यास का अंत इतना भारी है कि पत्थर दिल इंसान भी सिहर उठे।

होरी जीवन भर अपनी ‘मर्यादा’ बचाने के लिए पिसता रहा। न तन पर पूरा कपड़ा था, न पेट भर रोटी। आखिर में लू के थपेड़ों में मजदूरी करते हुए वह ज़मीन पर गिर पड़ता है और उसकी साँसें टूटने लगती हैं।

मरते वक्त पंडित दातादीन आते हैं और कहते हैं—”होरी जा रहा है, इसका गोदान करवाओ।”

तब धनिया रोते हुए घर में रखी सुतली बेचकर लाए मात्र बीस आने पंडित जी के हाथ पर रख देती है और भरे गले से कहती है:
“महाराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा। यही इनके गोदान हैं।”

जिस गाय को पालने की हसरत में होरी की पूरी उम्र तमाम हो गई, अंत में वही ‘गाय’ उसकी लाश पर एक धार्मिक पाखंड और बोझ बनकर खड़ी हो गई।

आज गोदान क्यों पढ़ें?
आज भले ही हम इंटरनेट, एआई और चमचमाते शहरों के दौर में जी रहे हों, लेकिन जब भी किसी गाँव से किसान की बदहाली या आत्महत्या की खबर आती है, तो समझ आता है कि ‘होरी’ आज भी मरा नहीं है। कर्ज़ का वह मकड़जाल, अफसरों-साहूकारों की मिलीभगत और धर्म के नाम पर पाखंड आज भी जस का तस मौजूद है।

गोदान हमें इंसानियत सिखाता है। यह बताता है कि ज़मीनी लोगों की तकलीफ़ों को समझे बिना किसी भी समाज का ‘विकास’ अधूरा और झूठा है।

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