गोदान : एक किसान की अधूरी हसरत और टूटते समाज का सच
आजकल एक ऐसा दौर चल रहा है जहाँ कुछ लोग अपनी बौद्धिक कुंठा या कथित आधुनिकता के फेर में प्रेमचंद, निराला और प्रसाद जैसे कालजयी रचनाकारों को नकारने की कोशिश करते हैं। ऐसा करके वे अपनी किसी नई दृष्टि का नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक शून्यता का ही परिचय देते हैं। बहरहाल, हम यहाँ बात करेंगे … Read more